यात्रा एवं पर्यटन

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मानव नामक प्राणी आरम्भ से ही जिज्ञासु प्रवृति का रहा है। नये-नये दर्शनीय स्थानों की खोज, वहाँ के नयनाभिराम द‍ृश्यों का अवलोकन, प्राकृतिक सौन्दर्य का भरपूर रसपान एवं विभिन्न प्रांत के निवासियों से मिलना सदैव उसे उत्तेजित करता रहा है। इसी उत्तेजना को प्राप्त करने की अभिलाषा मनुष्य को यात्रा तथा पर्यटन की ओर आकर्षित होने के लिये अत्यन्त प्राचीन काल से बाध्य करती रही है।

भारत में पर्यटन का उन्माद युगों-युगों से छाया रहा है और इसी लिये "तीर्थ-यात्रा" का प्रचलन बना। वाल्मीकि रामायण में वर्णन आता है कि 'श्रवण' के पिता 'शान्तनु' नेत्रहीन थे तथा उनकी माता भी अन्धी थीं इसलिये "तीर्थयात्रा" के लिये 'श्रवण' उन्हें काँवर में बिठा कर ले गये थे। देवर्षि नारद तो तीनों लोकों की यात्रा ही करते रहते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि 'चार धामों' की स्थापना केवल तीर्थयात्रा को महत्वपूर्ण बनाने के लिये ही की गई थी। अपनी विदुषी पत्‍नी 'रत्‍नावली' से तिरस्कृत होने के बाद तथा 'रामचरितमानस' की रचना करने के पूर्व संत श्री 'तुलसीदास' जी ने भी चारों धामों तथा अनेक तीर्थों की यात्रा की थी।

विदेशों में भी यात्रा के लिये कम उन्माद नहीं रहा है। ग्रीस के 'हेरोडोटस' ने ईसा पूर्व पाँचवीं शताब्दी में अनेक यात्रायें की थीं। सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री 'ह्वेन सांग' भारत यात्रा पर आये थे। इतिहास साक्षी है कि क्रिस्टोफर कोलम्बस, मार्को पोलो, ओड़ीसियस, वास्को डी गामा, मैगेलान, प्रेज़ेवाल्स्की, अवानासे निकितिन, तुर हीरडाल, जैक कास्तु आदि अनेक विदेशियों ने देश-विदेश की अनेक लम्बी यात्रायें की हैं।

प्रत्येक उम्र के व्यक्‍तियों में यात्रा के प्रति लगाव होता है। बच्चे तो यात्रा के दीवाने ही होते हैं। छुट्टियों में बाहर जाने के लिये वे इतने उत्तेजित रहते हैं कि महीनों पहले से वे योजना बनाने लगते हैं तथा भावी यात्रा की तैयारी में जुट जाते हैं।

नागरिकगण प्रायः निम्न लिखित कारणों से यात्रा करने के लिये प्रेरित होते हैं:

रोजमर्रा की उबाने वाली जिन्दगी में परिवर्तन लाकर पुनः नई स्फूर्ति पाने के लिये पर्वतों, नदियों, सागरों, वनों आदि के प्राकृतिक सौन्दर्य का रसपान करने के लिये पवित्र तीर्थ स्थानों के दर्शन करने के लिये

स्रोत: भारत दर्शन

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